इस
दौर का सबसे सटीक
विवरण यह है की
यह "सोशल मीडिया" का दौर है।
लघबघ 2010 से इसका बोलबाला
है । पहले देश
में mobile phones , फिर
wifi इंटरनेट और अब smart
phones और 4G डाटा की क्रांति है ।
जी हाँ, इस दौर में
यही सबसे बड़ी क्रांति है । नए
दौर के नए चलन
के चलते हिंदुस्तान में सोशल मीडिया के करीब 450 million users हैं । इतने ज़्यादा उपभोगता माने उतना ही ज़्यादा
propoganda , advertisement , demand
and supply ।
हर
क्रांति की तरह इस
क्रांति के भी नफे-नुक्सान दोनों ही हैं. नफे
गिनवाने की आवशयकता नहीं
है, सब जानते हैं,
हाँ नुक्सान को नज़र अंदाज़
करना इंसानी फितरत है । राजनीतिक
दलों (दल्लों ) का यह सबसे
आसान और सबसे अधिक
प्रभावशाली
propaganda tool बन
चूका है । आप
खुद बड़ी बड़ी agencies एवं
corporations को अपना उठना बैठना, पसंद नापसंद , दिनचर्या बताते हैं और वह उस
information को regulate
करके आपको और ज़ोर शोर
से अपना सामान बेच सकते हैं, privacy की धज्जियाँ उड़
जाती हैं सोशल मीडिया पे, लेकिन इन सब विषयों
पे बेहेस हो सकती है
और लम्बा discussion छिड़
सकता है , एक चीज़ है
जो पुरज़ोर हो रही है
वह है की यहां
शब्द सस्ते हो चुके हैं
।
आज
से कई वर्ष पहले,
दुसरे विश्व युद्ध और आज़ादी के
पहले और बाद का
जो दौर था विह idealism का दौर था । वह
और उसके बाद की कुछ पीडियों
में , साहित्य पड़े हुए, समाज और उसकी व्यवस्था
की एक अलग समझ
रखने वाले, इश्क़ में रमे हुए दिलवाले ही कलम उठाने
की हिमाकत करते थे। यदि अपने लिखित शब्द समाज तक पहुंचाने हो
और खुद को लेखक का
दर्जा देना हो, यदि सामाजिक टिपण्णी देने का साहस दिखाना
हो तो खु-बा-खुद यह दिलवाले एक
वैराग सा इख़्तियार कर
लिया करते थे ।
विचार
व्यक्त करने की क्रिया भी
कठिन थी। जिस बारे में लेखन हो उससे जुडी
किताबे पड़ी जाती थी, चाय वाले के यहां लगने
वाली शाम की महविल की
तकरीरों को गौर-तलब
सुना जाता था। ज़िन्दगी में कुछ चीज़ें झिंझोड़ती थी तभी कलम
उठती थी। पहले
तो कागज़ पे सीधा जज़्बात
उड़ेल दिए जाते थे, फिर उसके कई संशोधन होते
थे। कई बार एहि
क्रिया साधने के बाद अखबारों
और बौद्धिक पत्रिकाओं के दफ्तरों के
चक्कर लगते थे। अपनी राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा
के मशालची प्रकाशन घरों में भी लेखन प्रकाशित
करवाना मुश्किल था। इस सबके चलते
हुए समाज की अठखेलिआं , माँ-बाप की परेशानियां, बेरोज़गारी
और मुफलिसी की ज़िदगी का
एक नकारात्मक साया, फिर कहीं जाके अगर आपकी लेखनी
प्रकाशित हो भी गयी तो पड़ते समय उसमे खामियां नज़र आती होंगी, कई विचार राजनीतिक और
सम्पादकों के दबाव के चलते अपना दम तोड़ देते होंगे।
इतनी कीमत
चुकानी पड़ती थी अपने शब्दों को समाज के बीच परोसने में ताकि उसपे एक बौद्धिक वाद-विवाद
हो सके। हालांकि सभी लेखक मुफलिसी के शहर के बेनाम बाशिंदे नहीं थे, कई रईसों और साहूकारों
के संतानों ने भी कलम उठायी, मसलन खुशवंत सिंह, लेकिन शब्दों के प्रति और शब्दकला के
प्रति ईमानदारी बराबर थी। लेखनियाँ तथ्यों एवं निजी तजुर्बों से भरपूर होती थी।
मगर आज का
दौर अलग है। सोशल मीडिया की इस दुनिया ने एक समानतापूर्वक प्लेटफार्म खड़ा किया है जिसमे
कोई भी किसीसे सीधा सवाल पूछ सकता है और जो सवाल "viral " हो, अमूमन उसका जवाब
भी आता है।
इस बाहरी
छवि में एक सशक्तिकरण और समानता की झलक दिखती है पर इसके चलते जो phenomenon प्रचलित
है जिसे "self -commodification" कहा जा सकता है, हर एक को हर एक मुद्दे पे प्रतिक्रिया
देना फ़र्ज़ महसूस होता है, लेकिन उस मुद्दे पे चिंतन मंथन, विचार-विमर्श करना, एक तर्कसंगत
खोज बिलकुल आवश्यक नहीं लगती। इंसान की एक आदिम परवर्ती है, अपने आप को योद्धा मानने
की, और यह सोशल मीडिया के योद्धा बिना परिश्रम और कुर्बानी के ही योद्धा बनना चाहते
हैं। हाँ लेकिन युद्ध की एक युक्ति यह बखूबी जानते हैं, औरतों का शोषण। किसी भी औरत
को, जिससे विचारों से सहमत नहीं उससे "रंडी" बुला दिया, "बलात्कार की
धमकियाँ" "बीच चौराहे पे acid फेंक सकता हु" इस बात का घुमान, आम है
इन योद्धाओं के लिए ।
इन योद्धाओं
के लिए कभी भी कोई भी "terrorist" और "पाकिस्तानी", "खालिस्तानी" हो जाता है और कभी भी कोई भी, "nazi
", "RSS agent" और "islamophobe "।
यह कहना बिलकुल गलत है की बेवकूफों की तादात भाड़ गयी है, हाँ उन्हें एक जरिया ज़रूर मिल गया है अपनी बेवकूफी की नुमाइश करने का। शब्दों का बहुत पुराना इतिहास है, इतिहास रचयता यही हैं, इन्ही के कारण इंसानी सभ्यता है, इन्ही के कारण वह धर्म हज़ारों सालों से चल रहे हैं जो इंसानो को जीने का मक़सद भी दे रहे हैं और कातिल भी बना रहे हैं, इन्ही के कारण विचार जीवित हैं !
विचार की अभिवयक्ति का हक़ है और बहुत ज़रूरी भी है, लेकिन उससे भी ज़रूरी है एक ज़िम्मेदारी, समाज के प्रति, नैतिकता के प्रति, तर्कसंगत सोच के प्रति, शब्दों की ताकत के प्रति,
लेकिन शब्दों का क्या, शब्द तो सस्ते हो गए हैं।
विचार की अभिवयक्ति का हक़ है और बहुत ज़रूरी भी है, लेकिन उससे भी ज़रूरी है एक ज़िम्मेदारी, समाज के प्रति, नैतिकता के प्रति, तर्कसंगत सोच के प्रति, शब्दों की ताकत के प्रति,
लेकिन शब्दों का क्या, शब्द तो सस्ते हो गए हैं।
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